रविवार, 19 जुलाई 2015

हिंदुस्तान के गौरवशाली ऋषि-मुनियों का वैज्ञानिक इतिहास !

हिंदुस्तान के गौरवशाली ऋषि-मुनियों का वैज्ञानिक इतिहास !

जिनमे से कुछ का विवरण यहाँ हम दे रहें है, हिंदू वेदों को मान्यता देते हैं और वेदों में
विज्ञान बताया गया है । केवल सौ वर्षोंमें
पृथ्वीको नष्टप्राय बनाने के मार्ग पर लाने
वाले आधुनिक विज्ञान की अपेक्षा, अत्यंत
प्रगतिशील एवं एक भी समाजविघातक
शोध न करनेवाला प्राचीन ‘हिंदू विज्ञान’
था ।

पूर्वकालके शोधकर्ता हिंदु ऋषियों की बुद्धि
की विशालता देखकर आजके वैज्ञानिकोंको
अत्यंत आश्चर्य होता है । पाश्चात्त्य
वैज्ञानिकोंकी न्यूनता सिद्ध करनेवाला शोध
सहस्रों वर्ष पूर्व ही करनेवाले हिंदु ऋषि
मुनि ही खरे वैज्ञानिक शोधकर्ता हैं ।

*गुरुत्वाकर्षणका गूढ उजागर करनेवाले भास्कराचार्य !

भास्कराचार्य जी ने अपने 'सिद्धांतशिरोमणि’ ग्रंथ में गुरुत्वाकर्षण के
विषयमें लिखा है कि, ‘पृथ्वी अपने आकाश
का पदार्थ स्व-शक्तिसे अपनी ओर खींच
लेती हैं । इस कारण आकाश का पदार्थ
पृथ्वीपर गिरता है’ । इससे सिद्ध होता है
कि, उन्होंने गुरुत्वाकर्षणका शोध न्यूटनसे
५०० वर्ष पूर्व लगाया ।

* परमाणुशास्त्रके जनक आचार्य कणाद !

अणुशास्त्रज्ञ जॉन डाल्टनके २५०० वर्ष
पूर्व आचार्य कणादजीने बताया कि, ‘द्रव्यके
परमाणु होते हैं ।

’विख्यात इतिहासज्ञ टी.एन्. कोलेबुरक
जी ने कहा है कि, ‘अणुशास्त्रमें आचार्य
कणाद तथा अन्य भारतीय शास्त्रज्ञ
युरोपीय शास्त्रज्ञोंकी तुलनामें विश्वविख्यात थे ।’

* कर्करोग प्रतिबंधित करनेवाला पतंजली
ऋषि का योगशास्त्र !

‘पतंजलीऋषि द्वारा २१५० वर्ष पूर्व
बताया ‘योगशास्त्र’, कर्करोग जैसी दुर्धर
व्याधिपर सुपरिणाम कारक उपचार है ।
योगसाधनासे कर्करोग प्रतिबंधित होता है।’

- भारत शासनके ‘अखिल भारतीय
आयुर्विज्ञान संस्था’के (‘एम्स’के) ५ वर्षोंके
शोधका निष्कर्ष !

* औषधि-निर्मितिके पितामह : आचार्य
चरक !

इ.स. १०० से २०० वर्ष पूर्व कालके
आयुर्वेद विशेषज्ञ चरकाचार्यजी ।
‘चरकसंहिता’ प्राचीन आयुर्वेद ग्रंथ के
निर्माणकर्ता चरकजीको ‘त्वचा चिकित्सक’
भी कहते हैं ।

आचार्य चरकने शरीरशास्त्र, गर्भशास्त्र,
रक्ताभिसरणशास्त्र, औषधिशास्त्र
इत्यादिके विषयमें अगाध शोध किया था ।
मधुमेह, क्षयरोग, हृदयविकार आदि
दुर्धररोगोंके निदान एवं औषधोपचार
विषयक अमूल्य ज्ञानके किवाड उन्होंने
अखिल जगतके लिए खोल दिए ।

चरकाचार्यजी एवं सुश्रुताचार्यजी ने इ.स.
पूर्व ५००० में लिखे गए अर्थववेदसे ज्ञान
प्राप्त करके ३ खंडमें आयुर्वेदपर प्रबंध लिखे ।

* शल्यकर्ममें निपुण महर्षि सुश्रुत !

६०० वर्ष ईसापूर्व विश्वके पहले
शल्यचिकित्सक (सर्जन) महर्षि सुश्रुत
शल्यचिकित्साके पूर्व अपने उपकरण
उबाल लेते थे । आधुनिक विज्ञानने इसका
शोध केवल ४०० वर्ष पूर्व किया ! महर्षि
सुश्रुत सहित अन्य आयुर्वेदाचार्य
त्वचारोपण शल्यचिकित्साके साथ ही
मोतियाबिंद, पथरी, अस्थिभंग इत्यादिके
संदर्भ में क्लिष्ट शल्यकर्म करनेमें निपुण
थे । इस प्रकारके शल्यकर्मोंका ज्ञान
पश्चिमी देशोंने अभीके कुछ वर्षोंमें
विकसित किया है !

महर्षि सुश्रुतद्वारा लिखित ‘सुश्रुतसंहिता'
ग्रंथमें शल्य चिकित्साके विषयमें विभिन्न
पहलू विस्तृतरूपसे विशद किए हैं । उसमें
चाकू, सुईयां, चिमटे आदि १२५ से भी
अधिक शल्यचिकित्सा हेतु आवश्यक
उपकरणोंके नाम तथा ३०० प्रकार के
शल्यकर्मोंका ज्ञान बताया है ।

* नागार्जुन

नागार्जुन, ७वीं शताब्दीके आरंभके रसायन
शास्त्रके जनक हैं । इनका पारंगत वैज्ञानिक
कार्य अविस्मरणीय है ।

विशेष रूपसे सोने धातुपर शोध किया एवं
पारे पर उनका संशोधन कार्य अतुलनीय
था । उन्होंने पारे पर संपूर्ण अध्ययन कर
सतत १२ वर्ष तक संशोधन किया ।

पश्चिमी देशोंमें नागार्जुनके पश्चात जो भी
प्रयोग हुए उनका मूलभूत आधार नागार्जुन
के सिद्धांतके अनुसार ही रखा गया |

* बौद्धयन

२५०० वर्ष पूर्व (५०० इ.स.पूर्व) ‘पायथागोरस सिद्धांत’की खोज करनेवाले
भारतीय त्रिकोणमितितज्ञ । अनुमानतः
२५०० वर्षपूर्व भारतीय त्रिकोणमितिज्ञोंने
त्रिकोणमितिशास्त्र में महत्त्वपूर्ण शोध
किया । विविध आकार- प्रकार की यज्ञवेदियां बनाने की त्रिकोणमितिय
रचना- पद्धति बौद्धयनने खोज निकाली ।

दो समकोण समभुज चौकोन के क्षेत्रफलों
का योग करने पर जो संख्या आएगी उतने
क्षेत्रफलका ‘समकोण’ समभुज चौकोन
बनाना और उस आकृतिका उसके
क्षेत्रफलके समानके वृत्तमें परिवर्तन करना,
इस प्रकारके अनेक कठिन प्रश्नों को
बौद्धयनने सुलझाया ।

* ऋषि भारद्वाज

राइट बंधुओंसे २५०० वर्ष पूर्व वायुयान
की खोज करनेवाले भारद्वाज ऋषि !
आचार्य भारद्वाजजीने ६०० वर्ष इ.स.पूर्व
विमानशास्त्रके संदर्भमें महत्त्वपूर्ण
संशोधन किया । एक ग्रहसे दूसरे ग्रहपर
उडान भरनेवाले, एक विश्वसे दूसरे विश्व
उडान भरनेवाले वायुयानकी खोज, साथ
ही वायुयानको अदृश्य कर देना इस प्रकार
का विचार पश्चिमी शोधकर्ता भी नहीं कर
सकते । यह खोज आचार्य भारद्वाज जी ने
कर दिखाया ।

पश्चिमी वैज्ञानिकोंको महत्वहीन सिद्ध
करनेवाले खोज, हमारे ऋषि-मुनियोंने
सहस्त्रों वर्ष पूर्व ही कर दिखाया था । वे
ही सच्चे शोधकर्ता हैं ।

* गर्गमुनि

कौरव-पांडव कालमें तारों के जगत के
विशेषज्ञ गर्ग मुनिजीने नक्षत्रोंकी खोज की
। गर्गमुनिजीने श्रीकृष्ण एवं अर्जुन के
जीवन के संदर्भमें जो कुछ भी बताया वह
शत प्रतिशत सत्य सिद्ध हुआ । कौरव-
पांडवोंका भारतीय युद्ध मानव संहारक
रहा, क्योंकि युद्धके प्रथम पक्षमें तिथि क्षय
होने के तेरहवें दिन अमावस थी । इसके
द्वितीय पक्षमें भी तिथि क्षय थी । पूर्णिमा
चौदहवें दिन पड गई एवं उसी दिन
चंद्र ग्रहण था, यही घोषणा गर्ग मुनि जीने
भी की थी ।

तो मित्रो यही है हमारे मूर्धन्य वैज्ञानिक
ऋषि-मुनि.....

वंदे वैदिक भारत
जय अखंड भारत

समाज में नारी को भोगने का रोग लग गया है

- रेखा भाटिया
लगातार बढ़ती की घटनाओं के खिलाफ अमेरिका निवासी स्वतंत्र लेखिका रेखा भाटिया ने वेबदुनिया को अपने ज्वलंत विचार भेजे हैं।
रेखा भाटिया



ज्ञान की दृष्टि से देखें या विज्ञान की दृष्टि से खोजें- पांच तत्वों से बनी इस सृष्टि को जीवंत बनाने के लिए, उसकी सुंदरता, देखभाल, उसकी उन्नति और मानव जीवन की उत्पत्ति के लिए भगवान ने जो छटा तत्व बनाया है वह है 'नारी'। नारी जो धरती पर भगवान की प्रतिनिधि है। नारी जननी है। वह शक्ति है। उन्नति है। ममता का भाव है। जिम्मेदारियों की वाहक है। जीवन का रस है। वह मानव जाति का सम्मान है। समाज की धुरी है।

वह जीवन चक्र का केंद्रबिंदु है जहां से हर रिश्ता होकर गुजरता है। नारी जिसे हिन्दू धर्म में 'देवी' का स्थान प्राप्त है। जिसकी प्रतिमा को मंदिर में स्थापित कर पूजा जाता है। सम्मान प्रदान किया जाता है। ऐसी भारतीय संस्कृति, सभ्यता, समाज को कौनसा ग्रहण लग गया है जो उसे नारी को भोगने का रोग लग गया है।

आज का हमारा समाज, उसकी मानसिकता दोहरेपन का शिकार है। एक तरफ महिला को देवी का, शक्ति का रूप माना जाता है, दूसरी तरफ उसके औरत होने का अपमान कर उसके खिलाफ बलात्कार जैसे जघन्य में दिन दुगुनी रात चौगुनी बढ़ोतरी होती जा रही है। महिलाओं की सहनशक्ति, ख़ामोशी, धैर्य की ही हर बार हमारे समाज में परीक्षा ली जाती रही है। महिलाओं की चुप्पी भी इस तरह के अपराधों को बढ़ावा देने के लिए बहुत हद तक जिम्मेदार है।

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सर्वे के अनुसार रक्षक ही ज्यादातर केसेस में भक्षक बन जाते हैं। महिलाएं कभी परिवार की इज्जत की खातिर ,कभी परिवार की कुशलता से चिंतित रहती है तो कभी उसकी आवाज को कानून के रक्षक ही दबा देते हैं। कभी कोई सुनवाई नहीं होती। महिलाओं की खामोशी व धैर्य की वजह से उसे कमजोर मान लिया जाता है। औरत की ताकत उसकी भीतरी शक्ति होती है।

लेकिन अब बस। बहुत परीक्षा हो चुकी। लानत है समाज के ऐसे दोहरे संस्कारों, परंपराओं और मापदंडों पर। जब एक नारी का बलात्कार होता है तो वह सिर्फ शरीर का ही नहीं मन का,आत्मा का,संपूर्ण होता है।

मानवता की सभी हदों को पार कर ऐसे घिघौने अपराध आम होते जा रहे हैं और सरकार, प्रशासन, लोकतंत्र और कानून के रखवाले मूक दर्शक बन खामोश से तमाशा देखते रहते हैं। अपराधी ऐसे जघन्य अपराध करने के बाद भी आसानी से जमानत पर छुट जाते हैं। अदालतों में केस की सुनवाई और फैसले में कई वर्ष गुजर जाते हैं। कभी गवाह खरीद लिए जाते हैं, कभी डर या ऊंची पहुंच की वजह से गवाह केस से दूर हट जाते हैं। कभी सालों बाद फैसला आ भी जाता है तो अपराधी की सजा इतनी कड़ी नहीं होती है। सारी जिल्लत औरत को ही सहनी पड़ती है।

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हमारे प्रशासन और समाज की इन्हीं कमजोरियों की वजह से ऐसी घटनाएं लगातार बढ़ती जा रही हैं। महिलाओं के विरुद्ध अपराध करने वाले अपराधियों को जल्द से जल्द संक्षिप्त अवधि में अदालत से इतनी कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए जिससे दूसरे अपराधियों की रूह तक कांप उठे ताकि वह अपराध करने से पहले दस बार सोचें। तभी भारत को महिलाओं के लिए अधिक सुरक्षित बनाया जा सकता है।

स्त्रियों के विरुद्ध सिर्फ भारत में ही नहीं सारे विश्व में बलात्कार और घरेलू हिंसा जैसे अपराध आम हैं। लेकिन विश्व के जिस भी भू-भाग में कानून सख्त हैं, सख्ती से कानून का पालन होता है, अपराधी को जल्द से जल्द कड़ी सजा सुनाई जाती है, न्याय किया जाता है वहां ऐसे अपराधों की संख्या कम है। वहां महिलाएं अधिक सुरक्षित हैं।

विश्व के जिन भू-भागों में स्त्रियां अधिक सुरक्षित हैं, समाज में उन्हें समान अधिकार प्राप्त हैं,उचित सम्मान प्राप्त है, वह देश, वह समाज अधिक खुशहाल है, उन्नतिशील है। इसमें कोई दो मत नहीं हैं। अमेरिका में एक बात बहुत अच्छी है मानव (इसमें स्त्रियां, बालिकाएं समेत सभी लिंग और आयु के व्यक्ति) के विरुद्ध किसी भी तरह का शारीरिक, मानसिक अपराध करने वाले अपराधी को सजा की अवधि पूरी हो जाने के बाद भी पुलिस के पास अपना नाम, पता ,सोशल सिक्योरिटी नंबर रजिस्टर करवा कर रखना पड़ता है। समय-समय पर पुलिस थाने में जाकर उपस्थिति दर्ज करानी पड़ती है और यदि ऐसे अपराधी एक राज्य से दूसरे राज्य में जाते हैं वहां तक भी इत्तला कर के जाना पड़ता है।

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उन्हें चन्द नियमों का पालन करना पड़ता है जैसे वे बच्चों के स्कूल ,पार्क या किसी भी सार्वजनिक स्थान पर बच्चों के करीब नहीं जा सकते। इन नियमों का पालन नहीं करने पर उन्हें फिर से जेल भी हो जाती है। इस तरह के सख्त और अच्छे कानून और समय पर न्याय मिलने की वजह से आम नागरिक का सिस्टम पर विश्वास भी बना रहता है और एक डर भी बना रहता है। जिससे अपराधों पर नियंत्रण रहता है। महिलाएं व बच्चे अधिक सुरक्षित महसूस करते हैं।

हैवानियत का जाति ,धर्म, समाज से कोई लेना देना नहीं है। अपराधिकता की एक ही निर्लज्ज,कुटिल व पापी सोच होती है। यह हमारे देश के लिए,समाज के लिए किसी भयंकर बीमारी से भी अधिक खतरनाक है। इन अपराधों का देश और समाज के स्वास्थ्य पर विपरीत परिणाम पड़ता है।

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जिस युग में आज हम रह रहें हैं उसमें समूचा विश्व बहुत करीब आ गया है। वैश्वीकरण,नारी स्वत्रंतता, साक्षरता के चलते भारत में भी महिलाओं में बहुत बदलाव आया है। वे पहले के मुकाबले अधिक आत्मनिर्भर और शिक्षित हैं। घर से बाहर निकल काम पर जाती हैं, कई जिम्मेदारियों का एक साथ निर्वाह करती हैं। घर के साथ-साथ बाहर की दुगनी जिम्मेदारी और सम्मान आधा भी नहीं?

मां के गर्भ में ही मार दी जाती है कन्याएं और नहीं मारी जाती हैं जहां सम्मान के साथ पढ़ाया-लिखाया जाता है वहां बाबुल की दहलीज से विदा होते ही दहेज के नाम पर बलि चढ़ा दी जाती हैं। बच भी गई तो वहशी दरिंदें बैठे हैं चारों और झपटने को। जो बची-खुची हैं उनमें से कई घरेलू हिंसा की शिकार हैं, कानून का कोई सहारा नहीं? इतनी दयनीय स्थिति में होते हुए भी बेचारी भारतीय नारी जीवन जी रही हैं। बड़े शर्म की बात है समाज के लिए।

'क्या खाक नारी स्वतंत्रता?

बात 'स्वतंत्रता' की नहीं 'समझदारी'की है। सही और गलत की भी नहीं मानसिक बदलाव की है। भारत में अभी पूरी तरह से मानसिक बदलाव नहीं आया है और मानसिकता बदलने से ही सामाजिक बदलाव संभव है। भारतीय महिलाओं में दैहिक स्वतंत्रता, आर्थिक स्वतंत्रता से सशक्तिकरण संभव नहीं है जब तक उन्हें निर्णय लेने की स्वयं को आजादी नहीं है।

'नारी स्वतंत्रता' बहुत जरुरी है,पर स्वतंत्रता भी जिम्मेदारी,अनुशासन और सम्मान के साथ हो तभी अधिक टिकाऊ होती है।

अंत में बस इतना ही 'नारी तू ही है जननी, तू ही माटी, तू ही नदिया की धारा, तू ही स्वच्छ हवा है, तू ही प्रेम का राग, तुझसे ही है हरियाली चारों और जीवन में,तू ही अर्धनारीश्वरी,तू ही तो है शक्ति का अपार भंडार,तुझसे ही है अस्तित्व सभी का,फिर क्यों यह जग ना समझे तुझे एक मामूली-सा इंसान भ

मेवाड़ की रानी पद्मिनी : एक शौर्य गाथा वीर वीरांगनाओं की धरती राजपूताना




मेवाड़ की रानी पद्मिनी : एक शौर्य गाथा वीर वीरांगनाओं की धरती राजपूताना
शंखनादी सुनील दीक्षित द्वारा
मेवाड़ की रानी पद्मिनी : एक शौर्य गाथा वीर वीरांगनाओं की धरती राजपूताना

वीर वीरांगनाओं की धरती राजपूताना.....जहाँ के इतिहास में आन बान शान या कहें कि सत्य पर बलिदान होने वालों की अनेक गाथाएं अंकित है.....एक कवि ने राजस्थान के वीरों के लिए कहा है :
"
पूत जण्या जामण इस्या मरण जठे असकेल
सूँघा सिर, मूंघा करया पण सतियाँ नारेल......"
{
वहां ऐसे पुत्रों को माताओं ने जन्म दिया था जिनका उदेश्य के लिए म़र जाना खेल जैसा था .....जहाँ की सतियों अर्थात वीर बालाओं ने सिरों को सस्ता और नारियलों को महंगा कर दिया था......(यह रानी पद्मिनी के जौहर को इंगित करता है)......}

१३०२ इश्वी में मेवाड़ के राजसिंहासन पर रावल रतन सिंह आरूढ़ हुए. उनकी रानियों में एक थी पद्मिनी जो श्री लंका के राजवंश की राजकुँवरी थी. रानी पद्मिनी का अनिन्द्य सौन्दर्य यायावर गायकों (चारण/भाट/कवियों) के गीतों का विषय बन गया था. दिल्ली के तात्कालिक सुल्तान अल्ला-उ-द्दीन खिलज़ी ने पद्मिनी के अप्रतिम सौन्दर्य का वर्णन सुना और वह पिपासु हो गया उस सुंदरी को अपने हरम में शामिल करने के लिए. अल्ला-उ-द्दीन ने चित्तौड़ (मेवाड़ की राजधानी) की ओर कूच किया अपनी अत्याधुनिक हथियारों से लेश सेना के साथ. मकसद था चित्तौड़ पर चढ़ाई कर उसे जीतना और रानी पद्मिनी को हासिल करना. ज़ालिम सुलतान बढा जा रहा था, चित्तौड़गढ़ के नज़दीक आये जा रहा था. उसने चित्तौड़गढ़ में अपने दूत को इस पैगाम के साथ भेजा कि अगर उसको रानी पद्मिनी को सुपुर्द कर दिया जाये तो वह मेवाड़ पर आक्रमण नहीं करेगा. रणबाँकुरे राजपूतों के लिए यह सन्देश बहुत शर्मनाक था. उनकी बहादुरी कितनी ही उच्चस्तरीय क्यों ना हो, उनके हौसले कितने ही बुलंद क्यों ना हो, सुलतान की फौजी ताक़त उनसे कहीं ज्यादा थी. रणथम्भोर के किले को सुलतान हाल ही में. ने फतह कर लिया था ऐसे में बहुत ही गहरे सोच का विषय हो गया था सुल्तान का यह घृणित प्रस्ताव, जो सुल्तान की कामुकता और दुष्टता का प्रतीक था. कैसे मानी ज सकती थी यह शर्मनाक शर्त.

नारी के प्रति एक कामुक नराधम का यह रवैय्या क्षत्रियों के खून खौला देने के लिए काफी था. रतन सिंह जी ने सभी सरदारों से मंत्रणा की, कैसे सामना किया जाय इस नीच लुटेरे का जो बादशाह के जामे में लिपटा हुआ था. कोई आसान रास्ता नहीं सूझ रहा था. मरने मारने का विकल्प तो अंतिम था. क्यों ना कोई चतुराईपूर्ण राजनीतिक कूटनीतिक समाधान समस्या का निकाला जाय ?
रानी पद्मिनी न केवल अनुपम सौन्दर्य की स्वामिनी थी, वह एक बुद्धिमता नारी भी थी. उसने अपने विवेक से स्थिति पर गौर किया और एक संभावित हल समस्या का सुझाया. अल्ला-उ-द्दीन को जवाब भेजा गया कि वह अकेला निरस्त्र गढ़ (किले) में प्रवेश कर सकता है, बिना किसी को साथ लिए, राजपूतों का वचन है कि उसे किसी प्रकार का नुकसान नहीं पहुंचाया जायेगा....हाँ वह केवल रानी पद्मिनी को देख सकता है..बस. उसके पश्चात् उसे चले जाना होगा चित्तौड़ को छोड़ कर.... जहाँ कहीं भी. उम्मीद कम थी कि इस प्रस्ताव को सुल्तान मानेगा. किन्तु आश्चर्य हुआ जब दिल्ली के आका ने इस बात को मान लिया. निश्चित दिन को अल्ला-उ-द्दीन पूर्व के चढ़ाईदार मार्ग से किले के मुख्य दरवाज़े तक चढ़ा, और उसके बाद पूर्व दिशा में स्थित सूरजपोल तक पहुंचा. अपने वादे के मुताबिक वह नितान्त अकेला और निरस्त्र था. पद्मिनी के पति रावल रतन सिंह ने महल तक उसकी अगवानी की.
महल के उपरी मंजिल पर स्थित एक कक्ष कि पिछली दीवार पर एक दर्पण लगाया गया, जिसके ठीक सामने एक दूसरे कक्ष की खिड़की खुल रही थी...उस खिड़की के पीछे झील में स्थित एक मंडपनुमा महल था जिसे रानी अपने ग्रीष्म विश्राम के लिए उपयोग करती थी. रानी मंडपनुमा महल में थी जिसका बिम्ब खिडकियों से होकर उस दर्पण में पड़ रहा था अल्लाउद्दीन को कहा गया कि दर्पण में झांके. हक्केबक्के सुलतान ने आईने की जानिब अपनी नज़र की और उसमें रानी का अक्स उसे दिख गया ...तकनीकी तौर पर.उसे रानी साहिबा को दिखा दिया गया था....सुल्तान को एहसास हो गया कि उसके साथ चालबाजी की गयी है, ...किन्तु बोल भी नहीं पा रहा था, मेवाड़ नरेश ने रानी के दर्शन कराने का अपना वादा जो पूरा किया था......और उस पर वह नितान्त अकेला और निरस्त्र भी था. परिस्थितियां असमान्य थी, किन्तु एक राजपूत मेजबान की गरिमा को अपनाते हुए,दुश्मन अल्लाउद्दीन को ससम्मान वापस पहुँचाने मुख्य द्वार तक स्वयं रावल रतन सिंह जी गये थे .....अल्लाउद्दीन ने तो पहले से ही धोखे की योजना बना रखी थी .उसके सिपाही दरवाज़े के बाहर छिपे हुए थे....दरवाज़ा खुला.......रावल साहब को जकड लिया गया और उन्हें पकड़ कर शत्रु सेना के खेमे में कैद कर दिया गया.
रावल रतन सिंह दुश्मन की कैद में थे. अल्लाउद्दीन ने फिर से पैगाम भेजा गढ़ में कि राणाजी को वापस गढ़ में सुपुर्द कर दिया जायेगा, अगर रानी पद्मिनी को उसे सौंप दिया जाय. चतुर रानी ने काकोसा गोरा और उनके १२ वर्षीय भतीजे बादल से मशविरा किया और एक चातुर्यपूर्ण योजना राणाजी को मुक्त करने के लिए तैयार की.
अल्लाउद्दीन को सन्देश भेजा गया कि अगले दिन सुबह रानी पद्मिनी उसकी खिदमत में हाज़िर हो जाएगी, दिल्ली में चूँकि उसकी देखभाल के लिए उसकी खास दसियों की ज़रुरत भी होगी, उन्हें भी वह अपने साथ लिवा लाएगी. प्रमुदित अल्लाउद्दीन सारी रात्रि सो न सका...कब रानी पद्मिनी आये उसके हुज़ूर में, कब वह विजेता की तरह उसे भी जीते.....कल्पना करता रहा रात भर पद्मिनी के सुन्दर तन की....प्रभात बेला में उसने देखा कि एक जुलुस सा सात सौ बंद पालकियों का चला आ रहा है. खिलज़ी अपनी जीत पर इतरा रहा था. खिलज़ी ने सोचा था कि ज्योंही पद्मिनी उसकी गिरफ्त में आ जाएगी, रावल रतन सिंह का वध कर दिया जायेगा...और चित्तौड़ पर हमला कर उस पर कब्ज़ा कर लिया जायेगा. कुटिल हमलावर इस से ज्यादा सोच भी क्या सकता था.

खिलज़ी के खेमे में इस अनूठे जुलूस ने प्रवेश किया......और तुरंत अस्तव्यस्तता का माहौल बन गया...पालकियों से नहीं उतरी थी अनिन्द्य सुंदरी रानी पद्मिनी और उसकी दासियों का झुण्ड......बल्कि पालकियों से कूद पड़े थे हथियारों से लेश रणबांकुरे राजपूत योद्धा ....जो अपनी जान पर खेल कर अपने राजा को छुड़ा लेने का ज़ज्बा लिए हुए थे. गोरा और बादल भी इन में सम्मिलित थे. मुसलमानों ने तुरत अपने सुल्तान को सुरक्षा घेरे में लिया. रतन सिंह जी को उनके आदमियों ने खोज निकाला और सुरक्षा के साथ किले में वापस ले गये. घमासान युद्ध हुआ, जहाँ दया करुणा को कोई स्थान नहीं था. मेवाड़ी और मुसलमान दोनों ही रण-खेत रहे. मैदान इंसानी लाल खून से सुर्ख हो गया था. शहीदों में गोरा और बादल भी थे, जिन्होंने मेवाड़ के भगवा ध्वज की रक्षा के लिए अपनी आहुति दे दी थी.

अल्लाउद्दीन की खूब मिटटी पलीद हुई. खिसियाता, क्रोध में आग बबूला होता हुआ, लौमड़ी सा चालाक और कुटिल सुल्तान दिल्ली को लौट गया.

उसे चैन कहाँ था, जुगुप्सा का दावानल उसे लगातार जलाए जा रहा था. एक औरत ने उस अधिपति को अपने चातुर्य और शौर्य से मुंह के बल पटक गिराया था. उसका पुरुष चित्त उसे कैसे स्वीकार का सकता था....उसके अहंकार को करारी चोट लगी थी....मेवाड़ का राज्य उसकी आँख की किरकिरी बन गया था. कुछ महीनों के बाद वह फिर चढ़ बैठा था चित्तौडगढ़ पर, ज्यादा फौज और तैय्यारी के साथ. उसने चित्तौड़गढ़ के पास मैदान में अपना खेमा डाला. किले को घेर लिया गया......किसी का भी बाहर निकलना सम्भव नहीं था...दुश्मन कि फौज के सामने मेवाड़ के सिपाहियों की तादाद और ताक़त बहुत कम थी. थोड़े बहुत आक्रमण शत्रु सेना पर बहादुर राजपूत कर पाते थे लेकिन उनको कहा जा सकता था ऊंट के मुंह में जीरा. सुल्तान की फौजें वहां अपना पड़ाव डाले बैठी थी, इंतज़ार में. छः महीने बीत गये, किले में संगृहीत रसद ख़त्म होने को आई. अब एक ही चारा बचा था, "करो या मरो." या "घुटने टेको." आत्मसमर्पण या शत्रु के सामने घुटने टेक देना बहादुर राजपूतों के गौरव लिए अभिशाप तुल्य था,.........ऐसे में बस एक ही विकल्प बचा था झूझना.....युद्ध करना.....शत्रु का यथासंभव संहार करते हुए वीरगति को पाना.

बहुत बड़ी विडंबना थी कि शत्रु के कोई नैतिक मूल्य नहीं थे. वे न केवल पुरुषों को मारते काटते, नारियों से बलात्कार करते और उन्हें भी मार डालते. यही चिंता समायी थी धर्म परायण शिशोदिया वंश के राजपूतों में. .......और मेवाड़ियों ने एक ऐतिहासिक निर्णय लिया.....किले के बीच स्थित मैदान में लकड़ियों, नारियलों एवम् अन्य इंधनों का ढेर लगाया गया.....सारी स्त्रियों ने, रानी से दासी तक, अपने बच्चों के साथ गोमुख कुन्ड में विधिवत पवित्र स्नान किया....सजी हुई चित्ता को घी, तेल और धूप से सींचा गया....और पलीता लगाया गया. चित्ता से उठती लपटें आकाश को छू रही थी......नारियां अपने श्रेष्ठतम वस्त्र-आभूषणों से सुसज्जित थी.....अपने पुरुषों को अश्रुपूरित विदाई दे रही थी....अंत्येष्टि के शोकगीत गाये जा रही थी. अफीम अथवा ऐसे ही किसी अन्य शामक औषधियों के प्रभाव से प्रशांत हुई, महिलाओं ने रानी पद्मावती के नेतृत्व में चित्ता कि ओर प्रस्थान किया.....और कूद पड़ी धधकती चित्ता में....अपने आत्मदाह के लिए....जौहर के लिए....देशभक्ति और गौरव के उस महान यज्ञ में अपनी पवित्र आहुति देने के लिए. जय एकलिंग, हर हर महादेव के उदघोषों से गगन गुंजरित हो उठा था. आत्माओं का परमात्मा से विलय हो रहा था.
अगस्त २५, १३०३ कि भोर थी, आत्मसंयमी दुखसुख को समान रूप से स्वीकार करनेवाला भाव लिए, पुरुष खड़े थे उस हवन कुन्ड के निकट, कोमलता से भगवद गीता के श्लोकों का कोमल स्वर में पाठ करते हुए.....अपनी अंतिम श्रद्धा अर्पित करते हुए.... प्रतीक्षा में कि वह विशाल अग्नि उपशांत हो. पौ फट गयी.....सूरज कि लालिमा ताम्रवर्ण लिए आकाश में आच्छादित हुई.....पुरुषों ने केसरिया बागे पहन लिए....अपने अपने भाल पर जौहर की पवित्र भभूत से टीका किया....मुंह में प्रत्येक ने तुलसी का पता रखा....दुर्ग के द्वार खोल दिए गये. जय एकलिंग....हर हर महादेव कि हुंकार लगते रणबांकुरे मेवाड़ी टूट पड़े शत्रु सेना पर......मरने मारने का ज़ज्बा था....आखरी दम तक अपनी तलवारों को शत्रु का रक्त पिलाया...और स्वयं लड़ते लड़ते वीरगति को प्राप्त हो गये. अल्लाउद्दीन खिलज़ी की जीत उसकी हार थी, क्योंकि उसे रानी पद्मिनी का शरीर हासिल नहीं हुआ, मेवाड़ कि पगड़ी उसके कदमों में नहीं गिरी. चातुर्य और सौन्दर्य की स्वामिनी रानी पद्मिनी ने उसे एक बार और छल लिया था.